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सोमवार, 27 जून 2011

जल अमृत होता है


चिन्टू भइया रोज़ नहाते
बाथरूम के अन्दर।
उछल-कूद कर खूब नहाते
लगते नटखट बन्दर।।

मम्मी डाँटें पापा डाँटें
नहीं  मानते  वे  हैं।
पानी की किल्लत होने पर
भौंह  तानते  वे  हैं।।
एक  दिवस पूरी टंकी का
खत्म  हुआ  जब  पानी।
बिजली भागी, हुआ अँधेरा  
याद आ गई नानी।।

बूँद-बूँद  को  तरसे  चिन्टू
तनिक न मुँह धो  पाए।
और प्यास के मारे उनके
प्राण  हलक  में  आए।।

 समझ आयी पानी की कीमत
आईं    भूलें   याद।
गलती पर अपनी पछताए
खूब करी फरियाद।।

उसको यह माँ ने समझाया
जल अमृत होता है।
समझ-बूझकर खर्च करें तो
पड़ता कब टोटा है।।
  राकेश चक्र 

गमले घर पर लाएँगे


गमले  घर  पर  लाएँगे।
पौधे   सभी  लगाएँगे।
फू ल  यूँ  मुस्कराएँगे।
सबके  मन  को  भाएँगे।
शुद्ध  हवा को करते हैं,
इनको  आज  बचाएँगे।
जब भी छुट्टी पाएँगे,
पौधें  में  रम  जाएँगे।
घर-घर  को  महकाएँगे।
सारे   बच्चे   गाएँगे।
गमले  घर  पर  लाएँगे।
पौधे    सभी  लगाएँगे।
राकेश चक्र 

फूल लुभाते सबको


फूल लुभाते सबको भाई।
‘छाया’ हो या ‘जग्गू’ भाई।
चले बाग में दोनों हँसकर,
सुमन देख आँखें ललचाई।

इच्छा होती    तोडे़ सबको,
लालच से भरते हैं मन को।
नजर घुमाते इधर-उधर  को, 
पैरों में कपकपी समाई।।
फल लुभाते सबको भाई।।

खिले फूल कहते हैं हँस लो,
हाथों से हमको न मसलो।
दूर-दूर से हमसे रस लो।
कुछ तो जानो पीर पराई।।
फूल लुभाते सबको भाई।।

महक उड़ी फूलों से भाई।
सबको लगती है सुखदाई।
महिमा सबने इनकी गाई।
न करते हैं स्वयं बड़ाई।।
फूल लुभाते सबको भाई।।

फूलों से बच्चों ने जाना,
यह जीवन है सफर सुहाना।
डाल पे हिल-मिल गाते गाना,
आओ मिलकर करें भलाई।।
फूल लुभाते सबको भाई।।
-राकेश चक्र 

पेड़


पीपल, बरगद पेड़ बड़े हैं
सबके   हैं   हितकारी।
अनगिन पंछी मधुर तान में
करते   रोज़   सवारी।।

उनके फल भोजन बन जाते
लगते सबको प्यारे।
चोंच मारकर खाते रहते
मिल-जुलकर के सारे।।

छेर  भी  करते  बैठे-बैठे
पत्ते   हो   रहे   गंदे।
फिर भी पेड़ बुरा नहीं मानें
रोज़    बैठाते   कंधे !
आज जमाना बदल गया है
मिटा रहे आपस का प्यार।
नहीं किसी के काम आ रहे
जैसे पेड़ करें उपकार।।
-राकेश चक्र