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सोमवार, 25 जून 2012

"एक नदी है ज़िन्दग़ी" (राकेश "चक्र")

घाव है ताजा तनाव 
घट रही है ज़िन्दगी।
आजकल तो काँच का घर 
बन गई है जिन्दगी।।

कौन अपना कौन दुश्मन 
ये समझ आता नहीं।
चील के हैं पंख फैले 
शुक यहाँ गाता नहीं।
पत्थरों से दिल लगाकर 
पिस रही है जिन्दगी।।

आदमी निज घर सजाता,
गैर से मतलब नहीं।
प्यार में भी अर्थ खोजें,
मित्र अच्छे अब नहीं।
घर से बाहर गन्दगी की,
इक नदी है ज़िन्दग़ी।।

जो भी तूफां उठ रहे हैं,
वो कहाँ तक जायेंगे।
जब न होगा अन्न-जल तो,
हम यहाँ क्या खायेंगे?
आसमां को चूमकर, 
बारूद की जिन्दगी।।

धूप के भी रंग सारे, 
अब नजर आते नहीं।
अपनों के भी संग अब तो,
क्यों हमें भाते नहीं?
शहर के वीरान पथ पर,
पल रही है जिन्दगी।।

दर्द सारे बढ़ रहे हैं,
विष वमन कर जल रहे।
हिमनदों की भाँति वह भी,
नित्य प्रति ये गल रहे।
मौत के सायों में अब तो,
चल रही है जिन्दगी।।

रविवार, 24 जून 2012

"सोने की बैसाखी" (राकेश "चक्र")


सोने की  बैसाखी देकर, पाँव हमारे छीन लिए।
नवयुग ने शहरीपन देकर, गाँव हमारे छीन लिए।।


होली की फागों से सारा, जीवन ही रँग जाता था,
और मल्हारों से सावन भी, मन्द-मन्द मुस्काता था,
आपस के नातों की ममता का सागर लहराता था,
जाति-धर्म का, ऊँच-नीच का, भेद नहीं भरमाता था,
कंकरीट के इस जंगल ने गाँव हमारे छीन लिए।
सोने की  बैसाखी देकर, पाँव हमारे छीन लिए।।


पेड़ काटकर, घर बनवाकर, वैभव अपना बढ़ा लिया,
और प्रदूषण की ज्वाला से, अपना जीवन जला लिया,
धरती का सिंगार छीनकर, उसको विधवा बना दिया,
नित परमाणु परीक्षण करके, विष साँसों में मिला दिया,
और काटकर तरुवर शीतल, ठाँव हमारे छीन लिए।
सोने की  बैसाखी देकर, पाँव हमारे छीन लिए।।


पश्चिम ने कर डाला देखो, भारत माँ का चीर हरण,
और स्वयम्वर में खुद हमने, उस पापी का किया वरण,
होते-होते राख हो गये, निज जीवन के स्वर्णिम क्षण,
चारों ओर पराजय का डर, पायें कैसे कहीं शरण,
हमको नकली पाशा देकर, दाँव हमारे छीन लिए।
सोने की  बैसाखी देकर, पाँव हमारे छीन लिए।।